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Wednesday, October 20, 2021

पढ़िए एक ऐसे शख्श की कहानी जिसके सामने अंग्रेजी सरकार ने टेक दिए थे घुटने

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कवरेज इंडिया न्यूज़ डेस्क

आज महात्मा गांधी की 152वीं जयंती है. पूरी दुनिया में इस दिन को विश्व अहिंसा दिवस के रूप भी में मनाया जाता है. महात्मा गांधी को हम महानता और बलिदान की मूर्ति के रूप में देखते आए हैं. उनकी अहिंसक नीतियों और नैतिक आधारों ने और अधिक लोगों को आंदोलन से जोड़ा. बापू के जयंती पर उनके जीवन से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातों के बारे में जानेंगे.

 

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2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में जन्मे मोहनदास करमचंद गांधी के जीवन पर कई किताबें लिखी गई हैं. एक किताब बताती है कि 10 साल की उम्र तक आते-आते गांधीजी ने कई स्कूल बदले थे. स्कूल बदलने के अलग-अलग कारण थे. परीक्षा परिणामों में पर्सेंटेज 45 से 55 के बीच रहता था. वे बहुत होनहार विद्यार्थी नहीं थे. कक्षा में बालक मोहनदास की उपस्थिति बहुत कम रही. कक्षा तीसरी में वे 238 दिनों में 110 दिन ही स्कूल गए. मतलब वे स्कूल जाने में कच्चे थे.

 

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गांधी जी ने अहिंसा के मार्ग पर चलकर भी अंग्रेजी हुकूमत को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. अंत में उन्हे देश छोड़कर भागना पड़ा. बापू सभी को अहिंसा के रास्ते पर चलने की सलाह देते थे. इसलिए गांधी जी के जनमदिवस को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रुप में भी मनाया जाता है.. आज हम गांधी जी के उन आन्दोलनों के बारे में आपको बताते हैं. जिन आन्दोलनों की वजह से अंग्रेजी सरकार भारत छोड़ने के लिए मजबूर हो गई..

 

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23 साल की उम्र में पहुंचे दक्षिण अफ्रीका

1891 में वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद गांधी जी भारत वापस लौटे, लेकिन नौकरी के सिलसिले में उन्हें वापस दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा. 23 साल की उम्र में वह दक्षिण अफ्रीका पहुंचे थे और एक सप्ताह बाद डरबन से प्रोटीरिया की यात्रा करते समय उन्हें धक्के मारकर व पीटकर ट्रेन से फेंक दिया गया. जबकि उनके पास फर्स्ट क्लास का टिकट था, यह नस्लीय भेद का कारण था. किसी भी भारतीय या अश्वेत का प्रथम श्रेणी में यात्रा करना प्रतिबंधित था. इस घटना ने गांधी जी को बुरी तरह आहत किया, जो अंग्रजो की अफ्रीका में ही नहीं भारत में भी महंगा पड़ा.

 

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देश की आजादी में जुड़े

गांधी जी ने देश के हालात को समझने के लिए भारत भ्रमण की योजना बनाई, जिससे देश की नब्ज को जान सकें और लोगों से जुड़ सकें. उन्होंने असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन का भी नेतृत्व किया था. देश की स्वतंत्रता में गांधी जी के योगदान को शब्दों में नहीं मापा जा सकता. उन्होंने अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के साथ मिलकर अंग्रेजो को भारत छोड़ने के लिए मजबूर किया था.

 

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बिना सिले हुए कपड़े पहनते थे

महात्मा गांधी सभी भारतीयों से समानता दिखाने के लिए बिना सिले हुए कपड़े पहनते थे. उनका कहना था वह तभी अपने पूरे तन को कवर करेंगे जब सभी भारतीयों के पास पूरे तन का कपड़ा होगा. गांधी जी के आंदोलन के दौरान अंग्रेजी हुकूमत किसी को भी फोटो लेने की इजाजत नहीं देते थे. अंग्रेजों का ऐसा मानना था कि तस्वीर से आंदोलन बहुत बड़ा हो सकता है.

 

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महान आविष्कारक अल्बर्ट आइंस्टीन हुए बापू से प्रभावित

स्कूल में गांधी जी अंग्रेजी में अच्छे विद्यार्थी थे, जबकि गणित में औसत व भूगोल में कमजोर छात्र थे. उनकी हैंडराइटिंग बहुत सुंदर थी. महान आविष्कारक अल्बर्ट आइंस्टीन बापू से खासे प्रभावित थे. आइंस्टीन ने कहा था कि लोगों को यकीन नहीं होगा कि कभी ऐसा इंसान भी इस धरती पर आया था.

 

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बेहद हसमुख स्वभाव के थे गांधी

महात्मा गांधी की छवि आम तौर पर एक धीर-गंभीर विचारक, आध्यात्मिक महापुरुष और एक अनुशासन प्रिय राजनेता की रही है, लेकिन उनके ह्यूमर और हाजिरजवाबी का भी कोई जवाब नहीं था. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ‘जिसने महात्माजी की हास्य मुद्रा नहीं देखी, वह बेहद कीमती चीज देखने से वंचित रह गया.’

 

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‘मैन ऑफ लाफ्टर’

आजाद भारत के दूसरे और आखिरी गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी गांधी के बारे में कहते थे- ‘ही इज ए मैन ऑफ लाफ्टर. वहीं सरोजिनी नायडू तो महात्मा गांधी को प्यार से ‘मिकी माउस’ बुलाती थीं. गांधी जी भी अपने पत्रों में उनके लिए ‘डियर बुलबुल’, ‘डियर मीराबाई’, यहां तक कि कभी-कभी मजाक में ‘अम्माजान’ और ‘मदर’ भी लिखते थे.

 

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गांधी जी एक ऐसे आइकन हैं जिन्हें दुनिया भर के लोग प्यार करते हैं और उनका सम्मान करते हैं. उन्होंने न केवल अंग्रेजों के शासन से राष्ट्र की आजादी के लिए अथक प्रयास किया, बल्कि महात्मा गांधी की शिक्षाओं ने बच्चों सहित लोगों की पीढ़ियों को प्रेरित किया है. गांधी जी का जीवन शांति, अहिंसा, ईमानदारी और बहुत कुछ सीखाता है.

 

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गांधी जी ने ऐसे दिलाई आजादी

भारत छोड़ो आंदोलन: बापू के पांच प्रमुख आन्दोलन में से भारत छोड़ो आन्दोलन खास रहा है.. इसकी शुरुवात गांधी जी ने अगस्त 1942 में  की थी. इस आंदोलन के जरिए उन्होंने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया. इस आंदोलन के दौरान करो या मरो आरंभ करने का निर्णय भी गांधी जी ने लिया था. चंपारण सत्याग्रह: बिहार के चंपारण में गांधी के नेतृत्व में हुआ यह पहला सत्याग्रह था. गांधी जी ने खाद्यान के बजाय नील और अन्य नकदी फसलों की खेती के लिए बाध्य किए जाने वाले किसानों के समर्थन में यह सत्याग्रह 1917 में किया था. इसके बाद महात्मा गांधी ने 1920 में भारतीय नेशनल कांग्रेस के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन चलाया. इस आंदोलन ने भारत में स्वतंत्रता के संग्राम की एक नई ऊर्जा भरने का काम किया.

 

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वहीं नमक छोड़ो आंदोलन भी गांधी जी के प्रमुख आन्दोलन का हिस्सा है.. यह आंदोलन 13 मार्च.1930 से अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से शुरू हुआ था. यह आंदोलन ब्रिटिश राज के एक अधिकार के खिलाफ निकाला गया था. इस आंदोलन को दांडी यात्रा के नाम से भी जाना जाता है. इसके बाद बापू ने छुआछूत के विरोध में 8 मई 1933 में शुरुआत की थी. गांधी जी ने अखिल भारतीय छुआछूत विरोधी लीग की स्थापना 1932 में की थी.

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