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Wednesday, October 20, 2021

भगत सिंह की फांसी के बाद देशभर में क्यों हुआ था गांधी के खिलाफ विरोध? क्या महात्मा महात्मा गांधी फांसी रुकवा सकते थे?

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कवरेज इंडिया न्यूज़ डेस्क

आज सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफॉर्म्स पर आप यह सवाल कई बार देख चुके होंगे कि क्या गांधी भगत सिंह की फांसी रुकवा सकते थे? लोगों की इस सवाल को लेकर कई तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही है। आइए इस सवाल के जवाब को ढूंढने का प्रयास करते हैं।

जवाब से पहले यह समझना जरूरी है कि भगत सिंह और गांधी का लक्ष्य एक था पूर्ण स्वराज। लेकिन इस लक्ष्य को पाने के लिए दोनों के रास्ते अलग-अलग थे। महात्मा गांधी का हथियार था अहिंसा। तो इसके ठीक विपरीत भगत सिंह (Bhagat Singh Quotes) कहते थे, “बहरों को जगाने के लिए धमाके की जरूरत होती है।“

 

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23 मार्च की शाम करीब 7 बजे भगत सिंह को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। सूचना मिलते ही पूरे देश में आक्रोश का माहौल हो गया। 26 मार्च को कराची में कांग्रेस का अधिवेशन शुरू हुआ। 25 मार्च को अधिवेशन में हिस्सा लेने के लिए गांधी कराची पहुंचे तो वहां उन्हें भारी विरोध सहना पड़ा। लोगों ने गांधी का स्वागत काले झंडे दिखाकर, गांधी मुर्दाबाद (Gandhi Murdabad), गांधी गो बैक जैसे नारों से किया। रिपोर्टों की माने तो, उस दिन लोगों ने गांधी को खूनी तक कहकर संबोधित किया।

 

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अब सवाल का जवाब यह की, हां गांधी ने भगत सिंह के फांसी रुकवाने की कोशिश भरपूर की थी। 5 मार्च 1931 को गांधी और वायसराय इरविन (Gandhi-Ervin Deal 5 March 1931) के बीच समझौता हुआ। समझौते में गांधी ने संघर्ष के दौरान पकड़े गए सभी कैदियों को छोड़ने की बात रखी। हालांकि भगत सिंह को माफी नहीं मिल पाई। यह तो हम सभी को मानना होगा कि गांधी अंतिम ने अंतिम समय तक भगत सिंह की फांसी रुकवाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। गांधी का कराची अधिवेशन में देर से पहुंचने के पीछे भी कारण यही था कि गांधी 21 और 22 मार्च को भी इरविन से मिले। 23 मार्च की सुबह इरविन को चिट्ठी लिखना गांधी का आखिरी प्रयास था।

 

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पत्र में गांधी ने लिखा- शांति के हित में अंतिम अपील करना आवश्यक है। हालांकि आपने मुझे साफ -साफ बता दिया है कि भगत सिंह और अन्य दो लोगों की मौत की सजा में कोई भी रियायत की आशा न रखूं लेकिन डा सप्रू कल मुझे मिले और उन्होंने बताया कि आप कोई रास्ता निकालने पर विचार कर रहे हैं। अगर फैसले पर थोड़ी भी विचार की गुंजाइश है तो आपसे प्रार्थना है कि सजा को वापस लिया जाए या विचार करने तक स्थगित कर दिया जाए। गांधी जी (Gandhi Letter To Ervin For Bhagat Singh Bail) ने आगे लिखा, ”अगर मुझे आने की आवश्कता होगी तो आऊंगा. याद रखिए कि दया कभी निष्फल नहीं।”

 

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गांधी इस पत्र के बारे में कहते हैं कि 23 मार्च की सुबह मैंने उस निजी पत्र में अपनी आत्मा को उड़ेल दिया था। गांधीजी अपनी किताब ‘स्वराज’ में लिखते हैं, “मौत की सज़ा नहीं दी जानी चाहिए।”

गांधीजी जी कराची में विरोधियों के सवालों का जवाब देते हुए कहते हैं, किसी खूनी, चोर या डाकू को भी सजा देना मेरे धर्म के खिलाफ है। मैं भगत सिंह को नहीं बचाना चाहता था, ऐसा शक करने की तो कोई वजह ही नहीं हो सकती।

 

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मुस्कुराते-मुस्कुराते चढ़ गए फांसी के फंदे पर

कल्पना कीजिए, अगले क्षण आपको मृत्यु की सजा मिलने वाली है। आप जेल के सलाखों के बीच है और जेल के अन्य कैदियों की रोने की आवाज आपके कानों तक पहुंच रही है। परंतु, आप मुस्कुराते हुए गर्व महसूस कर रहे हैं की आप अपने राष्ट्र के लिए बलिदान देने जा रहे हैं। हमारी इस कल्पना को मात्र 23 वर्ष की उम्र में साकार किया था भारत के सुपुत्र शहीद ए आजम भगत सिंह (Saheed-e-azam Bhagat Singh) ने।

 

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फांसी की तारीख 24 मार्च 1931 तय की गई थी। भगत सिंह (Bhagat Singh), सुखदेव (Sukhdev), राजगुरु (Rajguru) जैसे महान क्रांतिकारियों के अदम्य साहस से घबराई अंग्रेजी हुकूमत ने गुप्त रूप से 23 मार्च (Saheed Diwas) की शाम को ही तीनों को फांसी के फंदे पर लटका दिया। उस समय पूरे राष्ट्र में भीषण रूप से तीनों की फांसी का विरोध किया जा रहा था।

 

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फांसी का कारण, भगत सिंह ने 1928 में एक ब्रिटिश जूनियर पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस मामले में तो भगत सिंह नहीं पकड़े गए। लेकिन इसके कुछ समय बाद बाद ही उन्होंने सेंट्रल असेंबली में बम (Bhagat Singh Central Assembly Bomb Story) फेंक दिया। इसके बाद वे भाग तो सकते थे लेकिन उन्होंने अपनी गिरफ्तारी दे दी। लंबी कार्रवाई के बाद भगत सिंह को फांसी की सजा दे दी गई।

 

इन तमाम बातों को जानने के पश्चात आप व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के जवाबों से अलग, Coverage India की इस रिपोर्ट में आपको तर्को और डाटा के आधार पर जवाब मिल ही गया होगा।

 

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