November 23, 2020

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उद्धव की तरह हाथरस केस में योगी को ललकार कर देखते अर्णब गोस्वामी, अंतर पता चल जाता

कवरेज इण्डिया न्यूज़ डेस्क

अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी के बाद से ही देश का हर पत्रकार अपनी बात कह रहा है। हैरानी की बात तो ये है कि कोई भी बड़ा चैनल या पत्रकार अर्नब के साथ खड़ा नहीं दिखाई दे रहा है। कारण भी साफ है…अर्नब अपने स्टूडियो से चिल्ला चिल्लाकर सभी पत्रकारों को डिजाइनर पत्रकार की संज्ञा दी थी, किसी भी चैनल को न्यूज़ चैनल नहीं माना। पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों को कभी नहीं माना। इंटीरियर डिजाइनर को खुदकुशी के लिए उकसाने के मामले में रिपब्लिक टीवी की एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी को मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार किया था। जिसके बाद अदालत ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। पुलिस के इस कदम की कई राजनेता और पत्रकार निंदा कर रहे हैं। इसे लेकर एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने भी एक फ़ेसबुक पोस्ट लिखा है।

 

देश के बड़े पत्रकारों में शुमार रवीश कुमार ने अपने पोस्ट में कई जगहों पर अर्णब की तारीफ की है और कुछ मुद्दों पर आलोचना भी की है। रवीश ने कहा कि जिस तरह से अर्णब अपने चैनल से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को ललकारते हैं। वैसे अगर हाथरस केस में योगी को ललकारा होता तो उन्हें अंतर पता चल जाता कि कौन सी सरकार संविधान का पालन कर रही है। रवीश ने कहा “भारत की पुलिस पर आंख बंद कर भरोसा करना अपने गले में फांसी का फंदा डालने जैसा है। झूठे मामले में फंसाने से लेकर लॉक अप में किसी को मार मार कर मार देने, किसी ग़रीब दुकानदार से हफ्ता वसूल लेने और किसी को भी बर्बाद कर देने का इसका गौरवशाली इतिहास रहा है।”

 

इंटीरियर डिजाइनर को खुदकुशी के लिए उकसाने के मामले में रिपब्लिक टीवी की एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी को मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार किया था। जिसके बाद अदालत ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। पुलिस के इस कदम की कई राजनेता और पत्रकार निंदा कर रहे हैं। इसे लेकर एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने भी एक फ़ेसबुक पोस्ट लिखा है।

 

उन्होने लिखा “उद्धव ठाकरे ने प्रचुर संयम का परिचय दिया है और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओ ने भी जिनकी एक छवि मारपीट की भी रही है। कई हफ्तों से अर्णब बेलगाम पत्रकारिता की हत्या करते हुए हर संवैधानिक मर्यादा की धज्जियां उड़ा रहे थे। पत्रकार रोहिणी सिंह ने ट्विट किया है कि यूपी में पत्रकारों के खिलाफ 50 से अधिक मामले दर्ज हुए हैं। क्या अर्णब में साहस है कि वे अब भी योगी सरकार को ललकार दें इस मसले पर। जो आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात कर रहे हैं वो सीमा की बात करने लगेंगे और अर्णब पर रासुका लगा दी जाएगा डॉ कफील ख़ान की तरह। गौरी लंकेश की हत्या के मामले को अर्णब ने कैसे कवर किया था? या नहीं किया था?

 

रवीश ने पूछा कि अर्णब ने मोदी सरकार पर क्या सवाल उठाए हैं, बेरोज़गारी से लेकर किसानों के मुद्दे कितने दिखाए गए हैं यह सब दर्शकों को पता है। उल्टा अर्णब गोस्वामी सरकार पर उठाने वालों को नक्सल से लेकर राष्ट्रविरोधी कहते हैं। भीड़ को उकसाते हैं। झूठी और अनर्गल बाते करते हैं। वे कहीं से पत्रकार नहीं हैं। उनका बचाव पत्रकारिता के संदर्भ में करना उनकी तमाम हिंसक और भ्रष्ट हरकतों को सही ठहराना हो जाएगा।

 

रवीश ने कहा “अर्णब गोस्वामी के केस में कहा जा रहा है कि महाराष्ट्र की पुलिस बदले की भावना से कार्रवाई कर रही है। ग़लत नहीं कहा जा रहा है। क्या दिल्ली पलिस और यूपी की पुलिस बदले की भावना से कार्रवाई नहीं करती है? अर्णब गोस्वामी ने कभी अपने जीवन में हमारी तरह ऐसा पोज़िशन नहीं लिया है। मुझे कुछ होगा तो अर्णब गोस्वामी एक लाइन नहीं बोलेंगे। अगर पुलिस किसी को दंगों के झूठे आरोप में फंसा दे तो अर्णब गोस्वामी पहले पत्रकार होंगे जो कहेंगे कि बिल्कुल ठीक है। पुलिस पर संदेह करने वाले ही ग़लत हैं। फिर भी एक नागरिक के तौर आप भी अर्णब के केस में पुलिस के बर्ताव का सख़्त परीक्षण कीजिए ताकि सिस्टम दबाव और दोष मुक्त बन सके। इसी में सबका भला है।”

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