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पढ़िए डाॅ मिथिलेश कुमार त्रिपाठी की नई रचना ‘संवेदना’

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संवेदना

 

जिस पर पड़ता वह ही सहता,

वही समझता गहरी पीर ।

कायर चीख – पुकार मचाते,

मौन व्यथा पी जाते धीर।।

नहीं चीखता चिल्लाता जो,

अर्थ नहीं वह पीड़ा – हीन।

उसके दिल में भी उठती है,

पीर निरन्तर गहरी पीन।।

कुछ निर्दय पर-तड़पन लख कर,

करते मधुर – मधुर उपहास ।

घायल उर पर लेप लगाना –

आता उन्हें न रंचक रास ।।

ऐसे कुटिल कलहप्रिय कामी,

पर-दुःख समझा करते खेल।

जल की जगह, आग में जलती,

डाला करते घी खर तेल।।

घायल की पीड़ा का अनुभव घायल दिल ही करता है।

स्वार्थी स्वार्थ – रोटियां उस पर सदा सेकता रहता है।

 

डाॅ मिथिलेश कुमार त्रिपाठी

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